किसी रोज़ खवाब में एक हसीं महफ़िल सजाई थी
आयेगे वोह एक दिन इस महफ़िल में ज़रुर
बस ये ही सोच कर ना जाने कब तक पलकें राह में बिछाई थी
चांदनी को भी बुलाया था सामियाने और रजाई भी मंगवाई थी
खूब बंधेगा समा जब आयेगे वोह
बस यही सोच कर जाम की प्यालिया भी भरवाई थी
किया इंतेज़ार बहुत पर उन्होंने ना आने की कसम खाई थी
बहुतो आए और जाम के प्याले खाली करचले गये
पर राह त्कते हुमने एक बूद ना होट्टो पर लगाई थी
इंतेज़ार करते करते पता ना चला कब रात ख़तम होने आई थी
व्यर्थ था ये इंतेज़ार यही सोच कर चल दिया घर की और
घर पहुँचता उससे पहले ख्वाब मेरा टूटा क्योंकि भोर होने को आई थी
By Gajendra Sidana
Not only Love but Hope is also the drug!
8 years ago
