Wednesday, April 22, 2009

ख्वाब जो नींद मैं रास्ता भटक गया

ख्वाब जो नींद मैं रास्ता भटक गया
कल बिस्तर पे बदल के करवट , सोचा किसी से मिल आता ,
जो न आया बहुत दिनों से , उस ख्वाब का पता लगा आता.

सड़क की भीड़ भाड़ से बचता , मैं कुछ गलियों से था निकल रहा ,
पहचानी नज़रों से छुपता , छज्जों के सायों से था गुज़र रहा .

चलते चलते रात हो चली , नज़रों की अब परवाह न थी ,
पर जो सोच चला था इसपे , शायद यह वह राह न थी .

ख्वाब मेरा वहा रहता था , घर से थोडी सी ही दूरी पे ,
अब इसमे मेरा दोष न था , मैं नींद मैं रास्ता भटक गया .

फिर सोचा की हो सकता है , वोह मुझे ढूँढने निकला हो ,
वापस घर जाकर मैं देखूं , सिरहाने पर बैठा हो .

यही सोचकर आज भी मैं , वापस घर को लौट गया ,
अब खवाब को भी मैं दोष क्या दूँ , वोह नींद मैं रास्ता भटक गया.

- अंकुर शुक्ला "गुटखा" -

1 comment:

gutkha said...

sale taxi
agar poem achhi nahi lagi thi to bol deta. crap world mein dal diya tune